अफजलियत अबु बकर

अर्ज़-ए-मुसन्निफ (लेखक की भूमिका)
الحمد للہ ربّ العالمین، والصلاۃ والسلام علی سید الانبیاء والمرسلین، وعلیٰ آلہٖ واصحابہٖ اجمعین۔
बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम
جَاءَ الْحَقُّ وَزَهَقَ الْبَاطِلُ ۚ إِنَّ الْبَاطِلَ كَانَ زَهُوقًا
(سورۃ الإسراء: 81)
यह संक्षिप्त रिसाला क़ुरआन-ए-करीम, मुअतबर तफ़ासीर और सहीह अहादीस-ए-मुबारका की रोशनी में
हज़रत सैय्यदना अबू बकर सिद्दीक़ رضی اللہ عنہمकी अफ़ज़लियत को स्पष्ट करने के लिए तैयार किया गया है।
इस लेखन का उद्देश्य किसी प्रकार की मुनाज़िराना बहस, झगड़ा या दिल-आज़ारी नहीं है, बल्कि अहले-ईमान के दिलों में सहाबा-ए-किराम رضی اللہ عنہم اجمعینकी अज़मत, अदब और सही अक़ीदे को मज़बूत करना है।
आज के फ़ितना-परवर दौर में कुछ लोग अपनी नाक़िस अक़्ल और ज़ाती तराज़ू के ज़रिये उन मुबारक हस्तियों के दर्जे तय करने की जुरअत करते हैं, जिनके मरातिब अल्लाह और उसके रसूल ﷺ ने ख़ुद मुक़र्रर फ़रमा दिए हैं।
ऐसे हालात में यह ज़रूरी हो गया था कि अहले-सुन्नत के मुसल्लमा, मुअतबर और मुत्तफ़क़-अलैह दलाइल को एक जगह जमा करके पेश किया जाए, ताकि हक़ वाज़ेह हो जाए और बातिल की गर्द छँट जाए।
इस रिसाले में ख़ज़ाइनुल इरफ़ान, नूरुल इरफ़ान, ज़िया-उल-क़ुरआन, तिब्यान-उल-क़ुरआन, तफ़सीर-ए-कबीर, अल-वसीत और दूसरी मुअतबर तफ़ासीर व कुतुब-ए-हदीस से वे नुसूस (स्पष्ट प्रमाण) नक़्ल किए गए हैं, जो साफ़ तौर पर इस बात पर दलील हैं कि
हज़रत अबू बकर सिद्दीक़ رضی اللہ ‘अफ़ज़लुस्सहाबा’ हैं।
साथ ही यह भी स्पष्ट किया गया है कि तमाम सहाबा-ए-किराम رضی اللہ عنہمआदिल, मुत्तक़ी और जन्नती हैं, हालाँकि उनके दर्जात में फ़र्क़ है, और यह फ़र्क़ ख़ुद रब्ब-ए-करीम ने बयान फ़रमा दिया है।
क़ारईन-ए-किराम से गुज़ारिश है कि इस रिसाले का मुतालआ अदब, इंसाफ़ और इख़्लास के साथ करें, और सहाबा-ए-किराम رضی اللہ عنہم اجمعینके बारे में वही अक़ीदा रखें जो
क़ुरआन, सुन्नत और असलाफ़-ए-उम्मत का मुत्तफ़क़-अलैह अक़ीदा है।
अल्लाह तआला हमें सहाबा-ए-किराम की मोहब्बत, उनके अदब और उनके नक़्श-ए-क़दम पर चलने की तौफ़ीक़ अता फ़रमाए, और गुमराह-कुन फ़ितनों से हमारी हिफ़ाज़त फ़रमाए।
وما علینا إلا البلاغ
और हमारा काम तो सिर्फ़ पहुँचा देना है।
واللہ ولیّ التوفیق
✍️ अबू अहमद एम जे अकबरी
ख़ादिम-ए-दारुल इफ़्ता गुलज़ार-ए-तैय्यबा
सूरह अल-हदीद : आयत 10 — तफ़सीरी दलीलें
सूरह अल-हदीद, आयत 10 की तफ़सीर में
हज़रत सैय्यद नईमुद्दीन मुरादाबादी رحمۃ اللہ علیہ
“ख़ज़ाइनुल इरफ़ान” में फ़रमाते हैं:
शान-ए-नुज़ूल:
कलबी رحمۃ اللہ علیہ ने कहा कि यह आयत
हज़रत अबू बकर सिद्दीक رضی اللہ تعالی عنہके हक़ में नाज़िल हुई,
क्योंकि:
वही सबसे पहले इस्लाम लाए
वही सबसे पहले राह-ए-ख़ुदा में माल ख़र्च करने वाले हैं
और वही रसूल-ए-करीम ﷺ की सबसे पहले और सबसे बड़ी मदद करने वाले हैं
इसी आयत की तफ़सीर में
हकीम-उल-उम्मत मुफ़्ती अहमद यार ख़ान नईमी رحمۃ اللہ علیہ
“नूरुल इरफ़ान” में फ़रमाते हैं:
(फ़िक़रा 12):
इस आयत में सहाबा-ए-किराम की बरकत से तमाम मुसलमानों को ख़ैरात व सदक़ा की तरगीब दी गई है।
यानी सब कुछ अल्लाह का है, तुम तो अस्थायी मालिक हो, फिर अल्लाह की राह में ख़र्च क्यों नहीं करते?
(फ़िक़रा 13):
इस आयत की शान-ए-नुज़ूल यह है कि यह
हज़रत अबू बकर सिद्दीक़ رضی اللہ عنہके हक़ में नाज़िल हुई।
आप ही सबसे पहले ईमान लाए, सबसे पहले राह-ए-ख़ुदा में ख़र्च किया और सबसे पहले हुज़ूर ﷺ की ख़िदमत की।
अगरचे नुज़ूल ख़ास है, मगर हुक्म आम है, इसलिए इसमें वे तमाम सहाबी शामिल हैं जो फ़त्ह-ए-मक्का से पहले ईमान लाए।
(फ़िक़रा 14):
इससे मालूम हुआ कि कोई भी मुसलमान सहाबी के बराबर नहीं हो सकता, और किसी मुसलमान का अमल सहाबा जैसा नहीं हो सकता, क्योंकि सहाबा को रसूल ﷺ की ख़िदमत का मौक़ा मिला और उनके आमाल की क़बूलियत की गवाही रब्ब की तरफ़ से आ चुकी है।
(फ़िक़रा 15):
यह भी मालूम हुआ कि ज़माना और वक़्त के एतिबार से आमाल का सवाब कम-ज़्यादा होता है, जैसे रमज़ान में नमाज़, रोज़ा और सदक़े का सवाब ज़्यादा होता है।
क़ुरआन की रोशनी में अफ़ज़लियत-ए-सिद्दीक़-ए-अकबर رضي الله عنه
अल्लाह तआला फ़रमाता है:
وَالسَّابِقُونَ الْأَوَّلُونَ مِنَ الْمُهَاجِرِينَ وَالْأَنْصَارِ وَالَّذِينَ اتَّبَعُوهُم بِإِحْسَانٍ رَّضِيَ اللَّهُ عَنْهُمْ وَرَضُوا عَنْهُ
(सूरह अत-तौबा: 100)
इस आयत-ए-करीमा में अल्लाह तआला ने साबिक़ीन-अव्वलीन की फ़ज़ीलत बयान फ़रमाई है।
अहले-सुन्नत के मुफ़स्सिरीन का इस पर इत्तिफ़ाक़ है कि:
साबिक़ीन-अव्वलीन में सबसे आगे
हज़रत अबू बकर सिद्दीक़ رضي الله عنه हैं
इस्लाम क़ुबूल करने में
माल क़ुर्बान करने में
रसूलुल्लाह ﷺ की नुसरत में
तफ़सीर-ए-ज़िया-उल-क़ुरआन
हज़रत पीर करम शाह अज़हरी رحمۃ اللہ علیہफ़रमाते हैं:
“साबिक़ीन-अव्वलीन में सबसे मुक़द्दम हज़रत अबू बकर सिद्दीक़ رضي الله عنه हैं,
क्योंकि आपने हर इम्तिहान में इस्लाम के लिए सबसे पहले क़ुर्बानी पेश की।”
यह बयान साफ़ करता है कि अफ़ज़लियत का मदार
किसी ज़ाती अंदाज़े पर नहीं,
बल्कि क़ुरआन के फ़ैसले पर है।
ग़ार-ए-सौर और सिद्दीक़-ए-अकबर رضي الله عنه
अल्लाह तआला फ़रमाता है:
إِذْ يَقُولُ لِصَاحِبِهِ لَا تَحْزَنْ إِنَّ اللَّهَ مَعَنَا
(सूरह अत-तौबा: 40)
यहाँ क़ुरआन ने साफ़ लफ़्ज़ों में
“صَاحِبِهِ” (अपने साथी) कहा।
अहले-सुन्नत का मुत्तफ़क़ अक़ीदा है कि:
“साथी” से मुराद
हज़रत अबू बकर सिद्दीक़ رضي الله عنه हैं
अल्लाह ने उन्हें
रसूल ﷺ की मय्यत (साथ) में बयान किया
और अपनी मआइयत (साथ होने) की ख़ुशख़बरी दी
तफ़सीर-ए-तिब्यान-उल-क़ुरआन
अल्लामा ग़ुलाम रसूल सईदी रहमतुल्लाह अलैह फ़रमाते हैं:
“ग़ार-ए-सौर की यह आयत
हज़रत अबू बकर رضي الله عنه की
अफ़ज़लियत और क़ुरब-ए-रसूल ﷺ
पर सबसे बड़ी क़ुरआनी दलील है।”
नमाज़ की इमामत — अफ़ज़लियत की खुली दलील
हदीस-ए-पाक में आता है:
“नबी-ए-करीम ﷺ ने अपनी बीमारी में
हज़रत अबू बकर رضي الله عنه को
नमाज़ की इमामत का हुक्म दिया।”
अहले-सुन्नत के उलेमा फ़रमाते हैं:
इमाम वही बनता है जो
सबसे अफ़ज़ल हो
रसूल ﷺ ने किसी और को नहीं,
बल्कि सिद्दीक़-ए-अकबर को आगे किया
यह इमामत
ख़िलाफ़त की तम्हीद
और अफ़ज़लियत की खुली गवाही है।
अहले-सुन्नत का मुत्तफ़क़ अक़ीदा
अहले-सुन्नत वल-जमाअत का अक़ीदा है कि:
तमाम सहाबा رضي الله عنهم
अदिल और जन्नती हैं
मगर अफ़ज़लियत का तरतीबी सिलसिला है
और उस सिलसिले में:
अफ़ज़लुस्सहाबा:
हज़रत अबू बकर सिद्दीक़ رضي الله عنه
फिर:
हज़रत उमर رضي الله عنه
हज़रत उस्मान رضي الله عنه
हज़रत अली رضي الله عنه
इसी तरतीब पर
इज्मा-ए-उम्मत क़ायम है।
नसीहत-आमेज़ पैग़ाम (आम अवाम के लिए)
जो लोग सहाबा-ए-किराम के मरातिब
अपनी अक़्ल से तौलते हैं,
वे दरअसल:
क़ुरआन से टकराते हैं
सुन्नत से मुँह मोड़ते हैं
और फ़ितने का दरवाज़ा खोलते हैं
ऐसे लोगों से दूरी रखना
ईमान की सलामती है।
अहादीस-ए-सहीहा की रोशनी में अफ़ज़लियत-ए-सिद्दीक़-ए-अकबर رضي الله عنه
नबी ﷺ का फ़ैसला — सबसे बड़ी दलील
रसूलुल्लाह ﷺ फ़रमाते हैं:
“अगर मैं अल्लाह के सिवा किसी को खलील बनाता,
तो अबू बकर को बनाता।”
(सहीह बुख़ारी, सहीह मुस्लिम)
इस हदीस से साफ़ ज़ाहिर है कि:
हज़रत अबू बकर رضي الله عنه
नबी ﷺ के सबसे क़रीबी
ईमान, दोस्ती और भरोसे में
सब पर फ़ाए़क़ हैं
माल के इनफ़ाक़ में सबसे आगे
हदीस-ए-पाक में आता है:
“अबू बकर ने अल्लाह की राह में
अपना सारा माल पेश कर दिया।”
जब रसूल ﷺ ने पूछा:
घर वालों के लिए क्या छोड़ा؟
तो अर्ज़ किया:
“अल्लाह और उसका रसूल ﷺ।”
(सुनन तिर्मिज़ी)
यह दर्जा:
न किसी और सहाबी को मिला
न मिल सकता है
यही कामिल तवक्कुल
और अफ़ज़लियत की निशानी है।
जन्नत में सबक़त
रसूलुल्लाह ﷺ फ़रमाते हैं:
“जो शख़्स एक ही दिन में
रोज़ा भी रखे,
जनाज़े में भी शरीक हो,
किसी मिस्कीन को खाना खिलाए
और बीमार की अयादत करे —
वह जन्नत में दाख़िल होगा।”
हज़रत अबू बकर رضي الله عنه ने अर्ज़ किया:
“या रसूलल्लाह!
ये सब मेरे अंदर मौजूद हैं।”
नबी ﷺ फ़रमाया:
“तुम जन्नती हो।”
(सहीह मुस्लिम)
इज्मा-ए-उम्मत — आख़िरी फ़ैसला
नबी ﷺ के विसाल के बाद:
तमाम सहाबा رضي الله عنهم
बिना किसी तकरार के
हज़रत अबू बकर رضي الله عنه
को ख़लीफ़ा बनाया
अगर अफ़ज़ल कोई और होता:
तो सहाबा ज़रूर पेश करते
मगर किसी ने इख़्तिलाफ़ नहीं किया
यह इज्मा है،
और इज्मा हक़ की पक्की दलील है।
अक़्ल बनाम वह़ी — एक ज़रूरी उसूल
अहले-सुन्नत का साफ़ उसूल है:
अक़्ल
वह़ी की पाबंद है
वह़ी
अक़्ल की मोहताज नहीं
जो लोग:
अपनी नाक़िस अक़्ल से
सहाबा के मरातिब तय करें
वे दरअसल:
क़ुरआन की मुख़ालिफ़त
सुन्नत की बेअदबी
और उम्मत में फ़ितना
फैलाते हैं
आम मुसलमान के लिए नसीहत
सहाबा-ए-किराम
हमारा ईमान हैं
उनका अदब
दीन की बुनियाद है
उनकी तौहीन
गुमराही का दरवाज़ा है
ऐसे लोगों से दूरी रखो
जो सहाबा के दर्जे
अपनी अक़्ल से तौलते हैं।
ख़ुलासा-ए-कलाम
क़ुरआन, हदीस और इज्मा
तीनों की रोशनी में:
🌟 अफ़ज़लुस्सहाबा:
हज़रत अबू बकर सिद्दीक़ رضي الله عنه
यह अक़ीदा:
अहले-सुन्नत का है
उम्मत का मुत्तफ़क़ है
और नजात का ज़रिया है
फ़ित्ना-परस्त सोच का इल्मी जायज़ा और अहले-सुन्नत का रास्ता
हक़ आ गया, बातिल मिट गया
अल्लाह तआला फ़रमाता है:
وَقُلْ جَاءَ الْحَقُّ وَزَهَقَ الْبَاطِلُ ۚ إِنَّ الْبَاطِلَ كَانَ زَهُوقًا
(सूरह अल-इसरा : 81)
यह आयत साफ़ एलान है कि:
हक़ जब आता है
तो बातिल ख़ुद मिट जाता है
बातिल कितनी ही सजावट कर ले
उसका अंजाम मिटना ही है
जो लोग:
सहाबा-ए-किराम رضي الله عنهم
के मरातिब पर सवाल उठाते हैं
हज़रत अबू बकर सिद्दीक़ رضي الله عنه
की अफ़ज़लियत में शक करते हैं
वे दरअसल:
क़ुरआन के फ़ैसले से टकराते हैं
रसूल ﷺ की सुन्नत को नज़रअंदाज़ करते हैं
उम्मत में फ़ितने की आग जलाते हैं
फ़ित्ना-ए-राफ़ज़ियत का मुख़्तसर रद्द
अहले-सुन्नत का उसूल बहुत साफ़ है:
सहाबा-ए-किराम
दीन के अमीन हैं
उन्हीं के ज़रिए
क़ुरआन और सुन्नत हम तक पहुँची
जो लोग:
सहाबा की तौहीन करें
या उनकी अफ़ज़लियत को
अपनी अक़्ल की तराज़ू में तौलें
वे:
दीन की जड़ पर वार करते हैं
उम्मत की एकता को तोड़ते हैं
ऐसे लोगों से दूरी रखना
ईमान की हिफ़ाज़त है।
आम मुसलमान के लिए आख़िरी पैग़ाम
ऐ मुसलमानो!
अपने ईमान की हिफ़ाज़त करो
सहाबा-ए-किराम से मोहब्बत रखो
उनके मरातिब पर बहस से बचो
याद रखो:
फ़ज़ीलत की तक़सीम
अल्लाह और उसके रसूल ﷺ
पहले ही कर चुके हैं,
अब तराज़ू उठाना
नादानी है।
जो शख़्स:
सहाबा का अदब करता है
वह सुन्नत पर है
और जो तौहीन करता है
वह गुमराही पर है
अहले-सुन्नत का इज्माई अक़ीदा (संक्षेप में)
अहले-सुन्नत वल-जमाअत का मुत्तफ़क़ अक़ीदा है:
1️⃣ तमाम सहाबा رضي الله عنهم
आदिल, मुत्तक़ी और जन्नती हैं
2️⃣ अफ़ज़लियत का तरतीबी क्रम:
🌟 अफ़ज़लुस्सहाबा:
हज़रत अबू बकर सिद्दीक़ رضي الله عنه
फिर:
हज़रत उमर رضي الله عنه
हज़रत उस्मान رضي الله عنه
हज़रत अली رضي الله عنه
3️⃣ यही अक़ीदा
सलफ़-ए-सालिहीन
और उम्मत का रास्ता है
ख़ात्मा और दुआ
अल्लाह तआला से दुआ है कि:
हमें सहाबा-ए-किराम رضي الله عنهم
की सच्ची मोहब्बत नसीब फ़रमाए
उनके अदब और मर्तबे को
दिलों में बसा दे
और हमें हर क़िस्म के
गुमराह फ़ितनों से महफ़ूज़ रखे
आमीन या रब्बल आलमीन
✍️ परिचय-ए-मुसन्निफ़
अबू अहमद एम.जे. अकबरी
ख़ादिम दारुल इफ़्ता गुलज़ार तैयबा

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