हज़रत अमीर मआविया
अलहम्दु लिल्लाहि रब्बिल आलमीन, वस्सलातु वस्सलामु अला सैय्यिदिल अंबिया वल मुरसलीन, व अला आलिही व अस्हाबिही अज्मईन।
सहाबा-ए-किराम रज़ियल्लाहु अन्हुम वह मुक़द्दस जमाअत है जिसे अल्लाह तआला ने अपने आख़िरी नबी हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा ﷺ की सोहबत, नुसरत और ख़िदमत के लिए मुन्तख़ब फ़रमाया। क़ुरआन-ए-करीम ने जहाँ उनकी जमाअती फ़ज़ीलत बयान फ़रमाई है, वहीं अहादीस-ए-नबविय्या में उनके मनाक़िब व शमाइल का तज़किरा जगह-जगह मिलता है। अहले-सुन्नत वल जमाअत का यह मुत्तफ़िक़ और इज्माई अक़ीदा है कि तमाम सहाबा-ए-किराम रज़ियल्लाहु अन्हुम आदिल, मुहतरम और वाजिबुल-ताज़ीम हैं, और उनके दरमियान पेश आने वाले इख़्तिलाफ़ात में ज़बान को रोकना और दिल को साफ़ रखना ही तरीक़ा-ए-अहले-सुन्नत है।
लेकिन अफ़सोस कि दौर-ए-हाज़िर में बाज़ गुमराह फ़िरक़े और फ़िक्री इंतिशार के शिकार अफ़राद तारीख़ के बाज़ वाक़िआत को बुनियाद बना कर सैय्यिदना अमीर मुआविया रज़ियल्लाहु अन्हु जैसे जलीलुल-क़द्र सहाबी पर तअ्न व तश्नीअ करते हैं, हालाँकि वह न सिर्फ़ सहाबी-ए-रसूल, कातिब-ए-वह़ी और ख़ालुल-मोमिनीन हैं, बल्कि फ़िक़्ह, हिल्म, सियासत, तदब्बुर और ख़िदमत-ए-इस्लाम में एक नुमायाँ मक़ाम रखते हैं।
ज़ेर-ए-नज़र रसाला “सैय्यिदना मुआवियाؓ पर तअ्न का इल्मी रद्द” इसी फ़ित्ना-ए-तअ्न का मुदल्लल, मुहक़्क़िक़ाना और मुनसिफ़ाना जवाब है, जिसमें क़ुरआन, हदीस, अक़वाल-ए-मुहद्दिसीन, अइम्मा-ए-सलफ़ और अकाबिर अहले-सुन्नत की रौशनी में यह वाज़ेह किया गया है कि सैय्यिदना मुआविया रज़ियल्लाहु अन्हु की शान में गुस्ताख़ी दरअसल सहाबा-ए-किराम रज़ियल्लाहु अन्हुम की जमाअत पर हमला है, जो किसी तौर क़ाबिल-ए-क़बूल नहीं।
अल्लाह तआला इस मुख़्तसर-सी काविश को क़बूल फ़रमाए, इसे अक़ीदा-ए-अहले-सुन्नत की हिफ़ाज़त का ज़रिया बनाए, और उम्मत-ए-मुस्लिमा को सहाबा-ए-किराम रज़ियल्लाहु अन्हुम की मुहब्बत और अदब पर क़ायम रखे। आमीन।
वल्लाह वलिय्युत-तौफ़ीक़
मुफ़्ती अबू अहमद एम जे अकबरी
दारुल इफ्ता गुलज़ार-ए-तैयबा
====================
तासरात मुफ्ती खैर मुहम्मद साहब
आस्ताद-ए-मुहतरम, शेख-ए-मुक़र्रम
हजरत मुफ़्ती एम जे अकबरी साहब दामत बरकातुहुम अल-आलिया
आपका यह ग़राँ क़दर रसाले जिसमें हजरत अमीर मुआविया رضي الله عنه पर होने वाले तअन्न व तशनिअ का इल्मी, उसुली और मुतवाज़िन रद्द पेश किया गया है, अस्र-ए-हाज़िर में अहल-ए सुन्नत के इल्मी ज़ख़ीरे में एक निहायत मजबूत और क़ाबिल-ए-इत्तिमाद इज़ाफ़ा है। यह महज़ जज़्बाती बचाव नहीं बल्कि नुसूस-ए-शरिया, उसुल-ए अहल-ए सुन्नत, अक़वॉल-ए आयमा और तारीखी मन्हज की रोशनी में मुर्तब किया गया ऐसा तहक़ीकी काम है जो क़ारी के ज़ेहन में पैदा होने वाले शक़ूकों को जड़ से ख़तम कर देता है।
आपने निहायत हिकमत के साथ यह वाज़ह फ़रमाया कि सहाबा-ए कराम رضي الله عنهم ख़ास तौर पर हजरत अमीर मुआविया رضي الله عنه के बारे में अहल-ए सुन्नत का मन्हज तअज़ीम, अदल और सुकूत-ए लिसान पर कायम है; न अफ़रात की इजाज़त है न तफ़रीत की।
रसाले का इम्तियाज़ यह है कि आपने तारीखी वाक़ियात को फिक़्ही व उसुली मीज़ान पर परखा, और साबित किया कि तअन्न दरअसल इतिहास नहीं बल्कि मन्हज-ए ज़लालत का शाख़साना है।
यह रसाला इस हक़ीक़त को भी पूरी ताक़त से उजागर करता है कि हजरत अमीर मुआविया رضي الله عنه
सहाबी-ए रसूल ﷺ
कातिब-ए वाही
खालु-उल-मु’मिनीन
और साहिब-ए इज्तिहाद थे।
और इज्तिहादी ख़ता पर तअन्न करना न सिर्फ़ गैर-इल्मी है बल्कि मुसलमानों के दिलों में सहाबा की अज़मत कम करने की मज़मूम कोशिश है। आपने दलीलों के साथ यह बात साबित कर दी कि अहल-ए सुन्नत के नज़र में इज्तिहादी ओर में सहाबा पर जرح करना बिदअत और ग़ुमराही है।
यह रसाला ख़ास तौर पर तल्लुब-ए इल्म, ख़ुतब़ा और अहल-ए दावत के लिए एक मस्तन्द हवाले वाली दस्तावेज़ है, जिसके ज़रिए वह फित्ना-ए सब्ब-ए सहाबा का मुदल्लल, बाउक़ार और इल्मी जवाब दे सकते हैं—
बग़ैर ग़ालम ग़लूच, बग़ैर इश्तिआल और बग़ैर हदूद-ए अदब से तजावज़ किए।
दुआ है कि:
अल्लाह तआला आपके इल्म में मज़ीद विसात अता फरमाए,
आपके क़लम को क़बूलियत-ए आम्मा بخشे,
आपको सहाबा-ए कराम رضي الله عنهم के बचाव की तौफीक़ पर अज्र-ए अज़ीम अता फरमाए,
और इस रसाले को फित्नों के इस दौर में अहल-ए सुन्नत के लिए ढाल बना दे।
अल्लाह तआला हमें सहाबा-ए कराम رضي الله عنهم की मुहब्बत पर ज़िंदा रखे,
उसी मुहब्बत पर मौत अता करे,
और क़ियामत के दिन उन्हीं के ज़ुम्रे में उठाए।
आमीन बिआज-ए सैय्यिदुल-मरसलिन ﷺ
क्या हज़रत मुआविया बिन अबी सुफ़यान رضي الله عنهما की फ़ज़ीलत साबित नहीं?
हज़रत सैय्यदना मुआविया बिन अबी सुफ़यान رضي الله عنهما पर कुछ लोग तरह-तरह के एतराज़ात और इल्ज़ामात करते रहते हैं। इन एतराज़ों में से एक यह भी है कि उनके फ़ज़ाइल में कोई हदीस मौजूद नहीं है, या यह कि जो हदीसें बयान की जाती हैं वे सहीह नहीं हैं, जिनसे उनकी फ़ज़ीलत साबित हो सके।
यह एतराज़ किस मक़सद से किया जाता है, यह समझना मुश्किल नहीं। आम तौर पर जिस अंदाज़ से यह बात कही जाती है, उससे नीयत और मंशा साफ़ ज़ाहिर हो जाती है।
हज़रत मुआविया رضي الله عنه की फ़ज़ीलत के सिलसिले में सबसे पहले यह बात ज़ेहन-नशीं रहनी चाहिए कि सहाबा-ए-किराम رضي الله عنهم के बारे में जो फ़ज़ाइल और मनाक़िब बिना किसी क़ैद और तख़सीस के क़ुरआन व हदीस में वारिद हुए हैं, उनमें हज़रत मुआविया رضي الله عنه भी बराबर के शरीक हैं। क्योंकि वह भी सहाबी-ए-रसूल हैं, और सहाबियत अपने आप में बहुत बड़ी फ़ज़ीलत है।
हज़रत मुआविया رضي الله عنه उन चुनिंदा और खुशनसीब सहाबा में से हैं जिन्हें बारगाह-ए-नबूवत ﷺ से कातिब-ए-वही होने का शरफ़ हासिल हुआ। आप वही-ए-इलाही लिखा करते थे। यह कोई मामूली दर्जा नहीं, बल्कि बहुत ऊँचा और अज़ीम मंसब है।
कुछ मुफ़स्सिरीन की तफ़सीर के मुताबिक़ क़ुरआन-ए-मजीद ने कातिबीन-ए-वही की फ़ज़ीलत और शराफ़त इस आयत में बयान की है:
﴿بِأَيْدِي سَفَرَةٍ كِرَامٍ بَرَرَةٍ﴾
(सूरह ‘अबस: 15–16)
तरजुमा:
“यह क़ुरआन ऐसे लिखने वालों के हाथों में है जो इज़्ज़त वाले, पाकबाज़ और नेक हैं।”
यह शान और अज़मत हज़रत अमीर मुआविया رضي الله عنه को भी हासिल है। अब जो शख़्स यह कहे कि हज़रत मुआविया رضي الله عنه की कोई फ़ज़ीलत नहीं, उसे अल्लाह से डरना चाहिए। वह कातिब-ए-वही हैं। जो हज़रत मुआविया رضي الله عنه को नहीं मानता, उसे यह भी सोचना चाहिए कि जिस क़ुरआन की वह तिलावत करता है, उसकी कुछ आयात वही हैं जिन्हें हज़रत मुआविया رضي الله عنه ने अपने हाथों से लिखा।
इसके अलावा ख़ास तौर पर भी हज़रत मुआविया رضي الله عنه के बहुत से फ़ज़ाइल हदीसों में वारिद हुए हैं। फ़िलहाल एक हदीस पेश की जाती है:
नबी-ए-करीम ﷺ ने दुआ फ़रमाई:
“अल्लाहुम्मज‘अल्हु हादियं मह्दियं वअह्दि बिही।”
(जामे‘ तिर्मिज़ी, हदीस नंबर: 3842)
तरजुमा:
“ऐ अल्लाह! मुआविया को हिदायत पाने वाला और दूसरों के लिए रहनुमा बना दे, और उनके ज़रिये हिदायत फैला।”
यह दुआ रसूलुल्लाह ﷺ की ज़बान-ए-मुबारक से निकली हुई है, और जिस सहाबी के हक़ में नबी ﷺ की दुआ साबित हो जाए, उसकी फ़ज़ीलत में किसी शक़ की गुंजाइश नहीं रहती।
अहले-सुन्नत वल-जमाअत का अकीदा यही है कि तमाम सहाबा-ए-किराम رضي الله عنهم अद्ल और फ़ज़ीलत वाले हैं, और हज़रत अमीर मुआविया رضي الله عنه भी उन्हीं में से एक अज़ीम सहाबी हैं। उनकी शान में बदगुमानी या गुस्ताख़ी करना गुमराही का रास्ता है।
दूसरी हदीस में आता है कि नबी करीम ﷺ ने सैय्यदना हज़रत मुआविया رضي الله عنه के लिए दुआ फ़रमाई:
اللّٰہُمَّ عَلِّمْ مُعَاوِیَۃَ الْکِتَابَ وَالْحِسَابَ وَ قِہِ الْعَذَابَ ۔
(مسند احمد: 28/383، رقم الحدیث: 17152)
तरजुमा:
ऐ अल्लाह! मुआविया को किताबुल्लाह और हिसाब का इल्म अता फ़रमा और उन्हें अज़ाब से महफ़ूज़ फ़रमा।
इस हदीस के बारे में अल्लामा अब्दुल अज़ीज़ पड़हारवी رحمۃ اللہ علیہ ने इसकी सिह्हत (प्रामाणिकता) को साबित किया है।
हज़ूर अक़रम ﷺ ने हज़रत मुआविया رضي الله عنه को क़ीमती नसीहतों से भी नवाज़ा। चنانچہ हदीस में आता है:
حَدَّثَنَا رَوْحٌ، قَالَ: حَدَّثَنَا اَبُوْ اُمَیَّۃَ عَمْرُو بْنُ یَحْیَی بْنِ سَعِیدٍ، قَالَ: سَمِعْتُ جَدِّیْ، یُحَدِّثُ، اَنَّ مُعَاوِیَۃَ، اَخَذَ الْإِدَاوَۃَ بَعْدَ اَبِيْ ہُرَیْرَۃَ یَتْبَعُ رَسُوْلَ اللہِ صَلَّی اللہُ عَلَیْہِ وَسَلَّمَ بِہَا، وَاشْتَکٰی اَبُوْہُرَیْرَۃَ، فَبَیْنَا ہُوَ یُوَضِّئُ رَسُوْلَ اللہِ صَلَّی اللہُ عَلَیْہِ وَسَلَّمَ رَفَعَ رَاْسَہٗ إِلَیْہِ مَرَّۃً اَوْ مَرَّتَیْنِ وَہُوَ یَتَوَضَّأ ، فَقَالَ: یَا مُعَاوِیَۃُ! إِنْ وُلِّیْتَ اَمْرًا فَاتَّقِ اللہَ عَزَّ وَجَلَّ وَاعْدِلْ ۔
(مسند احمد، رقم الحدیث: 16933)
तरजुमा:
हज़रत मुआविया رضي الله عنه, हज़रत अबू हुरैरा رضي الله عنه के बाद पानी का लोटा लेकर रसूलुल्लाह ﷺ के पीछे चल रहे थे। उस समय हज़रत अबू हुरैरा رضي الله عنه बीमार थे। इसी दौरान जब हज़रत मुआविया رضي الله عنه रसूलुल्लाह ﷺ को वुज़ू करा रहे थे, तो नबी करीम ﷺ ने वुज़ू करते हुए एक या दो बार उनकी तरफ़ सर उठाया और फ़रमाया:
“ऐ मुआविया! अगर तुम्हें किसी काम (हुकूमत या ज़िम्मेदारी) पर मुक़र्रर किया जाए, तो अल्लाह अज़्ज़ व जल्ल से डरना और अद्ल व इंसाफ़ से काम लेना।”
इस हदीस के तमाम रावी सिक़ा (विश्वसनीय) हैं और ये सहीह बुख़ारी के रावियों में शामिल हैं।
इसी तरह सैय्यदना हज़रत मुआविया رضي الله عنه की फ़ज़ीलत में ऐसी रिवायतें भी मौजूद हैं जिन्हें मुहद्दिसीन ने सहीह क़रार दिया है। चुनांचे सहीह बुख़ारी में भी इस विषय से संबंधित रिवायत मौजूद है।उमै़र बिन अस्वद अन्सी कहते हैं कि हिम्स (शाम) के समुंद्री तट पर हज़रत उबादह बिन सामित رضي الله عنه अपने मुक़ाम पर ठहरे हुए थे, और उनके साथ उनकी अहलिया हज़रत उम्मे हराम बिन्त मिलहान رضي الله عنها भी सफ़र में शरीक थीं।
इस मौक़े पर हज़रत उम्मे हराम رضي الله عنها ने बयान किया कि उन्होंने नबी करीम ﷺ को फ़रमाते हुए सुना:
“मेरी उम्मत का पहला लश्कर जो समुंद्री जिहाद करेगा, उसने अपने ऊपर जन्नत वाजिब कर ली।”
हज़रत उम्मे हराम رضي الله عنها ने अर्ज़ किया:
“या रसूलल्लाह ﷺ! क्या मैं भी उनमें शामिल होंगी?”
तो नबी करीम ﷺ ने फ़रमाया:
“तुम उनमें शामिल हो।”
फिर नबी करीम ﷺ ने फ़रमाया:
“मेरी उम्मत का पहला लश्कर जो मदीना-ए-क़ैसर (क़ुस्तुनतुनिया) से जिहाद करेगा, उसकी मग़फ़िरत कर दी जाएगी।”
इस पर हज़रत उम्मे हराम رضي الله عنها ने अर्ज़ किया:
“या रसूलल्लाह ﷺ! क्या मुझे भी उसमें शामिल होने की सआदत नसीब होगी?”
तो आप ﷺ ने फ़रमाया:
“नहीं।”मुहद्दिसीन के नज़दीक यह एक अमर-ए-मुसल्लम (स्वीकार्य और तयशुदा बात) है कि पहली बार जो ग़ज़वा-ए-बहर 27 हिजरी में पेश आया, जिसे ग़ज़वा-ए-क़ब्रुस (साइप्रस) कहा जाता है، उसमें हज़रत उबादह बिन सामित رضي الله عنه और उनकी अहलिया-ए-मुहतर्मा उम्मे हराम رضي الله عنها शरीक थीं।
इस बहरी ग़ज़वे के अमीर-ए-जैश हज़रत अमीर मुआविया رضي الله عنه थे, और उनकी अहलिया-ए-मुहतर्मा फ़ाख़िता رضي الله عنها बिन्त क़रज़ा भी उनके साथ थीं। इस लश्कर के हक़ में ज़बान-ए-नबूवत ﷺ से मुझदा (ख़ुशख़बरी) साबित है।
इसी वजह से हज़रत अमीर मुआविया رضي الله عنه के लिए यह एक बहुत बड़ी फ़ज़ीलत है कि उन्हें इसी दुनिया में जन्नत की बशारत नसीब हुई، और वह भी रसूलुल्लाह ﷺ की मुबारक ज़बान से। यह एक निहायत ही बड़ी सआदतमंदी और खुशनसीबी है।
अतः हज़रत अमीर मुआविया رضي الله عنه के हक़ में फ़ज़ीलत के न होने का क़ौल किसी भी सूरत में दुरुस्त नहीं ठहरता।
(सैरत-ए-अमीर मुआविया رضي الله عنه: 1/266, दारुल किताब, 2007ई.)
हज़रत अमीर मुआविया رضي الله عنه पर एक एतराज़ यह भी किया जाता है, जिसे कुछ मुहद्दिसीन—जैसे मज्द शीराज़ी ने सफ़रुस्सआदह में बयान किया है। चुनांचे यह कहा गया है कि हज़रत मुआविया رضي الله عنه के फ़ज़ाइल में कोई सहीह हदीस वारिद नहीं हुई। इसी तरह इमाम बुख़ारी رحمه الله ने भी हदीस इब्न मलैक़ा को “अल-मनाक़िब” या “अल-फ़ज़्ल” के बाब में लाने के बजाय “ज़िक्र मुआविया” के उनवान के तहत बयान किया है، जिससे यह शुबह पैदा किया जाता है कि मानो उनकी फ़ज़ीलत वारिद ही नहीं हुई।
इसका जवाब यह है कि हज़रत मुआविया رضي الله عنه की फ़ज़ीलत में दो हदीसें पहले बयान की जा चुकी हैं—एक मुस्नद अहमद की और दूसरी सुनन तिर्मिज़ी की।
अब अगर “अदम-ए-सिह्हत” से यह मुराद ली जाए कि उनकी फ़ज़ीलत में कोई हदीस साबित ही नहीं, तो यह बात बिल्कुल ग़लत है। और अगर “सिह्हत” से सिह्हत-ए-मुस्तलहा ‘इंदल-मुहद्दिसीन मुराद ली जाए, तो इसमें भी कोई हर्ज नहीं, क्योंकि इसका दायरा बहुत तंग है।
हक़ीक़त यह है कि सहीह हदीसों की क़िल्लत के कारण शरीअत के बहुत से अहकाम और फ़ज़ाइल हसन दर्जे की हदीसों से साबित होते हैं। और मुस्नद व सुनन की रिवायतें दर्जा-ए-हसन से कम नहीं होतीं। इसके अलावा फ़न-ए-हदीस में यह बात मुसल्लम है कि फ़ज़ाइल के बाब में हदीस-ए-ज़ईफ़ पर भी अमल किया जाता है, फिर हदीस-ए-हसन तो بدرजा-ए-ऊला क़ाबिल-ए-क़ुबूल है।
(हाँ, अकाइद में कबुल नहीं, बल्कि इसकी तफ़सीलात उसूल-ए-हदीस की किताबों में मौजूद हैं।)
इसके अलावा मैंने किसी मोअतबर किताब में साहिब-ए-मीज़ानुल-जामिअ अल्लामा मुजद्दिदुद्दीन इब्नुल-असीर رحمه الله का यह क़ौल भी देखा है कि हज़रत मुआविया رضي الله عنه की फ़ज़ीलत में मुस्नद की रिवायत सहीह है, हालांकि इस वक़्त वह किताब ज़ेहन में मुस्तहज़र नहीं।
इसी तरह शैख़ अब्दुल हक़ मुहद्दिस देहलवी رحمه الله ने भी शरह सफ़रुस्सआदह में इंसाफ़ से काम नहीं लिया, बल्कि मुसन्निफ़ के कलाम को साबित कर दिया और उस पर कोई गिरिफ़्त नहीं की, जबकि वह दूसरे मौक़िओं पर उनके तअस्सुबात पर नक़्द करते रहे हैं।
इमाम बुख़ारी رحمه الله के तरीक़े का जवाब यह है कि यह उनका तफ़न्नुन-ए-कलाम है। क्योंकि उन्होंने इसी अंदाज़ को हज़रत उसामा बिन ज़ैद, हज़रत अब्दुल्लाह बिन सलाम और हज़रत जुबैर बिन मुत्अिम رضي الله عنهم के ज़िक्र में भी अपनाया है। वहाँ भी “ज़िक्र” ही के उनवान के तहत उनके अज़ीम फ़ज़ाइल बयान किए हैं।
यहाँ यह कहा जा सकता है कि जब यह बात पहले कुछ लोगों ने कही और लिखी है, तो अगर हमने भी कह दी तो इसमें कौन सी नई बात है؟
इसका जवाब बिल्कुल साफ़ और सादा है कि वहाँ यह बात ताना और तनक़ीद के अंदाज़ में नहीं कही गई थी، इसके बावजूद अहले-सुन्नत के उलमा ने उसे क़ुबूल नहीं किया।
जबकि यहाँ तो एक मुकम्मल मोर्चा खोला जा रहा है, और बतौर-ए-तआन व तश्नीअ यह एतराज़ उछाला जा रहा है।
फिर किसी सहाबी رضي الله عنه के नाम के साथ किसी ख़ास फ़ज़ीलत का वारिद न होना एक बात है, लेकिन इसी को बुनियाद बनाकर किसी सहाबी رضي الله عنه को निशाना-ए-तआन बनाना, उनकी शख़्सियत पर जरह व क़दह करना बिल्कुल दूसरी बात है।
क्योंकि जमाअत-ए-सहाबा-ए-किराम رضي الله عنهم में बहुत से सहाबी ऐसे हैं जिनके बारे में कोई ख़ास फ़ज़ीलत वारिद नहीं हुई। तो क्या इससे यह साबित हो जाता है कि उनकी मजमूई फ़ज़ीलत का भी इनकार कर दिया जाए؟
और उनके ख़िलाफ़ तआन, तश्नीअ और तनक़ीद का बाज़ार गर्म कर दिया जाए؟ अल्लामा पड़हारवी رحمه الله फ़ज़ीलत-ए-सैय्यदना मुआविया رضي الله عنه में अहादीस लाने से पहले बतौर तमहीद फ़रमाते हैं:
’’اعلم أن صحابتہ الکرام مائۃ ألف وأربعۃ عشر ألفا کالأنبیاء ، ومن ورد فیہ أحادیث الفضائل أشخاص معدودۃ، وکفی بالصحبۃ فضلا للباقي، لترتب الفضائل العظیمۃ علیہا مما نطق بہ الکتاب والسنۃ۔ فإن فقدت أحادیث الفضائل لبعضہم أو قلّت فلا إحجاف بہ ۔‘‘
(الناہیۃ عن طعن أمیر المؤمنین معاویۃؓ، ص: 38)
तरजुमा:
नबी करीम ﷺ के सहाबा-ए-किराम رضي الله عنهم की तादाद तक़रीबन एक लाख चौदह हज़ार थी, जैसे अंबिया-ए-किराम عليهم السلام की तादाद बयान की जाती है। जिन सहाबा رضي الله عنهم के फ़ज़ाइल व मनाक़िब में ख़ास अहादीस वारिद हुई हैं, वे गिनती के चंद अफ़राद हैं। बाक़ी सहाबा رضي الله عنهم की फ़ज़ीलत के लिए सिर्फ़ रसूलुल्लाह ﷺ की सोहबत ही काफ़ी है, क्योंकि सहाबियत अपने आप में बहुत बड़ी फ़ज़ीलत है।
क़ुरआन और सुन्नत इसके अज़ीम फ़ज़ाइल पर साफ़ तौर पर नातिक़ और गवाह हैं। इसलिए अगर किसी सहाबी رضي الله عنه की फ़ज़ीलत में ख़ास अहादीस मौजूद न हों या बहुत कम हों, तो इसमें कोई नुक्ता-ए-ऐतराज़ या नुक़सान की बात नहीं।
मुहद्दिसीन ने इस बात की स्पष्ट तसरीह की है कि हज़रत अमीर मुआविया رضي الله عنه किबार, मुअज्ज़ज़ और मुज्तहिद सहाबा-ए-किराम رضي الله عنهم में से हैं। और अगर यह भी मान लिया जाए कि वह सिग़ार सहाबा में से हैं, तब भी इसमें किसी शक़ و शुबह की कोई गुंजाइश नहीं रहती कि वह सहाबा-ए-किराम رضي الله عنهم की फ़ज़ीलत में वारिद सहीह अहादीस के उमूम में पूरी तरह दाख़िल और शामिल हैं। बल्कि ख़ुद हज़रत मुआविया رضي الله عنه की ख़ास फ़ज़ीलत में भी अहादीस मौजूद हैं।
इसलिए यह कहना कि हज़रत मुआविया رضي الله عنه की फ़ज़ीलत साबित नहीं, एक ऐसी बात है जो क़ाबिल-ए-ग़ौर है और जिस पर गंभीरता से पुनर्विचार की ज़रूरत है।
ऊपर बयान की गई अहादीस और नक़्ल की गई इबारात से यह बात साबित होती है कि हज़रत मुआविया رضي الله عنه की ख़ुसूसी फ़ज़ीलत भी अहादीस-ए-सहीहह और अहादीस-ए-हसन से साबित है।
दूसरी बात यह है कि अगर—बहस के तौर पर—यह भी मान लिया जाए कि हज़रत मुआविया رضي الله عنه की फ़ज़ीलत में कोई सहीह हदीस नहीं है, बल्कि सिर्फ़ अहादीस-ए-ज़ईफ़ हैं, तो भी मुहद्दिसीन के नज़दीक यह एक मुसल्लम ज़ाब्ता है कि जब कोई ज़ईफ़ हदीस कई तरीक़ों से रिवायत की जाए, तो वह दर्जा-ए-ज़अफ़ से निकल कर दर्जा-ए-हसन तक पहुँच जाती है।
इसके अलावा क्या हज़रत मुआविया رضي الله عنه की फ़ज़ीलत, मनक़बत और इज़्ज़त के लिए यह बात काफ़ी नहीं कि वह सहाबी-ए-रसूल ﷺ हैं?
और क्या किसी सहाबी-ए-रसूल ﷺ के आलोचना से ऊपर होने के लिए यह बात काफ़ी नहीं कि उसे सोहबत-ए-रसूल ﷺ नसीब हुई हो?
इस बात का अंदाज़ा हमें हज़रत अब्दुल्लाह बिन अब्बास رضي الله عنهما की एक रिवायत से ख़ूब हो जाता है। जब हज़रत अब्दुल्लाह बिन अब्बास رضي الله عنهما के सामने वित्र की रकअतों के मसले में सैय्यदना हज़रत मुआविया رضي الله عنه की राय और उनका मौक़िफ़ पेश किया गया, तो रसूलुल्लाह ﷺ के चचेरे भाई, ख़ुद ऊँचे दर्जे के सहाबी, मुफ़स्सिर और आलिम हज़रत इब्न अब्बास رضي الله عنهما ने फ़रमाया:
“उनके बारे में कुछ मत कहो, क्योंकि यक़ीनन और बिलकुल तहक़ीक़ के साथ वह रसूलुल्लाह ﷺ के सहाबी हैं।”
और दूसरी रिवायत में आता है कि हज़रत इब्न अब्बास رضي الله عنهما ने फ़रमाया:
“उन्होंने सही कहा, इसमें कोई शक़ नहीं कि वह फ़क़ीह और मुज्तहिद हैं।”
मुलाहिज़ा फ़रमाएँ:
इब्न अबी मुलैका से रिवायत है। वे कहते हैं कि हज़रत मुआविया رضي الله عنه ने इशा के बाद एक रकअत वित्र अदा की। वहाँ हज़रत अब्दुल्लाह बिन अब्बास رضي الله عنهما के ग़ुलाम भी मौजूद थे। उन्होंने आकर यह बात हज़रत अब्दुल्लाह बिन अब्बास رضي الله عنهما को बताई, तो हज़रत इब्न अब्बास رضي الله عنه ने फ़रमाया:
“उन्हें कुछ मत कहो, बेशक वह रसूलुल्लाह ﷺ की सोहबत पा चुके हैं।”
यानी रसूलुल्लाह ﷺ की सहाबियत ऐसा अज़ीम शरफ़ है कि उसके होते हुए उनके बारे में रायज़नी और ऐतराज़ की गुंजाइश नहीं रहती।
इसी हदीस की शरह में अल्लामा ऐनी رحمه الله लिखते हैं:
’’(دعہ) ، أي: اترک القول فیہ والإنکار علیہ، فإنہٗ صحب رسول اللہ صلی اللہ علیہ وسلم وإنہٗ عارف بالفقہ۔‘‘
(عمدۃ القاری، जि. 16, स. 248, दार इहया-ए-तुरास अल-‘अरबी, बैरूत)
तरजुमा:
“उनके बारे में बोलना और उन पर ऐतराज़ करना छोड़ दो, क्योंकि वह रसूलुल्लाह ﷺ के सहाबी हैं और फ़िक़्ह व इज्तिहाद का इल्म रखते हैं।”
इसी तरह इब्न अबी मुलैका से ही रिवायत है:
’’عَنِ ابْنِ اَبِيْ مُلَیْکَۃَ، قِیْلَ لِابْنِ عَبَّاسٍ: ہَلْ لَکَ فِيْ اَمِیْرِ المُؤْمِنِیْنَ مُعَاوِیَۃَ، فَإِنَّہٗ مَا اَوْتَرَ إِلَّا بِوَاحِدَۃٍ؟ قَالَ: اَصَابَ، إِنَّہٗ فَقِیْہٌ ۔‘‘
(صحیح البخاری، كتاب المناقب، باب ذكر معاويۃؓ، رقم: 3765)
तरजुमा:
इब्न अबी मुलैका कहते हैं कि हज़रत अब्दुल्लाह बिन अब्बास رضي الله عنهما से कहा गया:
“क्या आप अमीरुल-मुमिनीन मुआविया رضي الله عنه के बारे में कुछ फ़रमाएँगे? उन्होंने तो सिर्फ़ एक रकअत वित्र पढ़ी है।”
तो हज़रत इब्न अब्बास رضي الله عنه ने फ़रमाया:
“उन्होंने ठीक किया है, बेशक वह फ़क़ीह हैं।”
यहाँ हज़रत अब्दुल्लाह बिन अब्बास رضي الله عنه, हज़रत मुआविया رضي الله عنه पर फ़िक़्ही तनक़ीद से भी मना फ़रमा रहे हैं, हालाँकि हज़रत मुआविया رضي الله عنه का यह अमल दूसरे सहाबा رضي الله عنهم के अमल से अलग था।
जैसा कि मुल्ला अली क़ारी رحمه الله ने इसकी तसरीह की है:
’’(فأتی ابن عباس فأخبرہٗ، فقال: دعہ) ، أی اترکہ ولا تعترض علیہ بالإنکار
(فإنہٗ قد صحب النبي صلی اللہ علیہ وسلم)
قال الطیبي، أي فلایفعل إلا ما رآہ، یعنی: ولعلہٗ رأی ما لم یر غیرہٗ
وأصحابہٗ کالنجوم بأیہم اقتدیتم اہتدیتم،
وہم عدول ولا یفعلون شیئا من تلقاء أنفسہم،
لکن الحدیث صریح في کون معاویۃ شاذا منفردا عن سائر الصحابۃؓ۔‘‘
(مرقاۃ المفاتیح، जि. 3, स. 954, رقم: 1277)
तरजुमा:
जब हज़रत इब्न अब्बास رضي الله عنه के ग़ुलाम ने आकर उन्हें यह ख़बर दी कि हज़रत मुआविया رضي الله عنه ने एक रकअत वित्र पढ़ी है, तो हज़रत इब्न अब्बास رضي الله عنه ने फ़रमाया:
“उन्हें छोड़ दो और उन पर ऐतराज़ न करो, क्योंकि उन्हें सहाबियत का शरफ़ हासिल है।”
अल्लामा तैबी رحمه الله (शारिह-ए-मिश्कात) फ़रमाते हैं:
इसका मतलब यह है कि वह सहाबी हैं, इसलिए वही अमल करेंगे जो उन्होंने रसूलुल्लाह ﷺ से देखा होगा। मुमकिन है कि उन्होंने कुछ ऐसा देखा हो जो किसी और ने न देखा हो।
रसूलुल्लाह ﷺ के सहाबी सितारों की तरह हैं—जिसका भी अनुसरण करोगे, हिदायत पाओगे।
वे सब आदिल हैं और अपनी तरफ़ से कुछ नहीं करते।
हालाँकि यह हदीस इस बात में बिल्कुल स्पष्ट है कि इस अमल में हज़रत मुआविया رضي الله عنه बाकी तमाम सहाबा رضي الله عنهم से अलग थे।इस हदीसِ मुबारक से दो अहम बातें साफ़ तौर पर समझ में आती हैं:
(1) हज़रत मुआविया رضي الله عنه की फ़ज़ीलत-ए-सोहबत,
(2) और इसी फ़ज़ीलत-ए-सहाबियत की बुनियाद पर उनका तनक़ीद से ऊपर होना।
इससे साफ़ मालूम होता है कि फ़ज़ाइल का बाब एक ज़ाइद चीज़ है; कितने ही सहाबा-ए-किराम رضي الله عنهم, सहाबियात رضي الله عنهن, बल्कि बहुत-से अंबिया-ए-किराम عليهم السلام ऐसे गुज़रे हैं जिनके नाम और शख़्सियत की तफ़सील के साथ कोई ख़ास हदीस मौजूद नहीं, तो क्या इससे उनकी शान में कोई कमी आ जाती है?
क्या किसी शख़्स की फ़ज़ीलत के लिए उसका नबी या सहाबी होना ही काफ़ी नहीं?
इसके अलावा, अक़वाल-ए-सलफ़-ए-सालिहीन से भी हज़रत मुआविया رضي الله عنه की शख़्सियत और मक़ाम आफ़ताब-ए-नीम-रोज़ की तरह रौशन और वाज़ेह है।
मशहूर मोअर्रिख़-ए-इस्लाम अल्लामा इब्न-ए-कसीर رحمه الله लिखते हैं कि मुहद्दिस-ए-कबीर हज़रत इमाम अब्दुल्लाह बिन मुबारक رحمه الله से पूछा गया:
हज़रत मुआविया رضي الله عنه अफ़ज़ल हैं या
हज़रत उमर बिन अब्दुल अज़ीज़ رحمه الله ?
तो उन्होंने फ़रमाया कि:
हज़ूर-ए-अकरम ﷺ की रफ़ाक़त और मइय्यत में जिहाद करते हुए जो मिट्टी हज़रत मुआविया رضي الله عنه के घोड़े की नाक में चली गई, उस मिट्टी के ज़र्रे भी हज़रत उमर बिन अब्दुल अज़ीज़ رحمه الله से अफ़ज़ल हैं।
(البدایہ و النہایہ، جلد: 8، صفحہ: 139)
यह भी आपकी अज़मत और शराफ़त की एक बड़ी दलील है कि आपको रसूलुल्लाह ﷺ से क़राबत और रिश्तेदारी भी हासिल थी।
आपकी हमशिरा उम्मुल-मोमिनीन सैय्यदा उम्मे हबीबा رضي الله عنها, नबी-ए-करीम ﷺ के हरम और ज़ौजियत में थीं।
इस तरह हज़रत मुआविया رضي الله عنه, रसूलुल्लाह ﷺ के बरादर-ए-निस्बती ठहरे, और ईमान व अमल के साथ क़राबत-ए-रसूल बहुत बड़ा शरफ़ है।
Comments
Post a Comment